कुल्लू टुडे
बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर
घोर जातिवाद, आडंबर, रूढ़िवादिता में सदियों से जकड़े समाज को उपर उठाने के लिए महान समाज सुधारक एवं दूरदर्शी ज्योतिबा फूले के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।
उन्होंने अपना जीवन शोषित, वंचित, तिरस्कृत एवं पीड़ित समाज को शिक्षा के माध्यम से जागरूक करने के लिए लगा दिया। डा. भीम राव अंबेडकर तथा ज्योतिबा फुले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नायक हैं, क्योकि इन्हीं के द्वारा रचित नियमावली पर आज देश अग्रसर है।
शनिवार को बैहना जट्टां पंचायत के गांव डोल में हिमाचल प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति, ओबीसी एवं अल्पसंख्यक वर्ग संयुक्त संघर्ष मोर्चा द्वारा महात्मा ज्योतिबा फुले जी की जयंती हर्षोल्लास से मनाई गई।
इस कार्यक्रम में मोर्चा के जिला महामंत्री आचार्य नंद लाल ने लोगों को ज्योतिबा फुले जी की जीवनी के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि 11 अप्रैल 1827 को जन्में ज्योतिबा फुले के पिता व्यवसायी थे तथा पंरपराओं में विश्वास रखते थे, लेकिन ज्योतिबा स्वाभिमानी थे, अल्पायु ही में उन्हें पांखड और जातिगत व्यवस्था का बोध हो गया तथा इसमें परिवर्तन करने के लिए वे समाज में एक मिसाल बनकर उभरे।
पढ़ाई की अहमियत समझने वाले ज्योतिबा फुले ने उस समय शूद्र परिवारों की बेटियों के लिए स्कूल और सांध्य कालीन विद्यालय भी खोले ताकि वे शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहे।
हिंदु विधवा विवाह पर पुर्नविचार, बाल विवाह, सती प्रथा को रोकने के लिए संघर्ष आदि ऐसे महान कार्य उनके द्वारा किए गए, जिससे आज समाज के लोग सिर उठाकर जीवन यापन कर रहे हैं।
नंद लाल आचार्य ने बताया क ज्योतिबा फुले 1840 में सावित्री बाई से परिणय सूत्र में बंधे। दोनो की विचारधारा मेल खा गई और सामाजिक क्रांति की ऐसी ईबारत लिखी जिसे आज भी अरबों लोग शिद्दत से याद और स्मरण करते हैं।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में मनोज कुमार, जितेंद्र कुमार, सुनील कुमार, रंजीत, देवराज, श्यामलाल, नंदलाल, मदन गोपाल, दीपक कुमार, हरि ओम आदि ने अहम भूमिका निभाई।
