कुल्लू टूडे
कुल्लू
रेशम सौम्य एवं शान शौकता वाला वस्त्र है जौ सार्वभौमिक एवं टिकाऊ है। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थितियां रेशम उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिये काफी अनुकूल है।
यह बात उपायुक्त आशुतोष गर्ग ने बुधवार को देव सदन में राष्ट्रीय सिल्क बोर्ड बैंगलोर तथा रेशम तकनीकी सेवा केन्द्र जम्मू द्वारा राज्य सिल्क बोर्ड व हस्तशिल्प के सहयोग से रेशम को बढ़ावा देने के संबंध में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि कही। कार्यशाला में जिला के अग्रणी बुनकरों ने भाग लिया।
आशुतोष गर्ग ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में लगभग 32 मीट्रिक टन यानि देश का केवल एक प्रतिशत रेशम उत्पादन होता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें आजीविका के लिये अपार संभावना है।
उन्होंने कहा कि सिल्क बोर्ड द्वारा हितधारकों व बुनकरों के लिये महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई। उन्होंने कहा कुल्लू की शॉल व ऊनी वस्त्र देश-दुनिया में मशहूर है और यदि रेशम को इस उद्योग में शामिल करने के प्रयास किये जाते हैं तो संभवतः इसमें गुणात्मक वृद्धि होगी और हजारों लोगों को रोजगार के साधन उपलब्ध होंगे।
उन्होंने कहा कि प्रोद्योगिकी के माध्यम से रेशम को अपग्रेड किया जा सकता है। इससे स्थानीय बुनकरों के लिये एक नवोन्मेष मिलेगा। रेशम को यहां की शॉल व अन्य ऊनी वस्त्रों में मिश्रण करके एक मजबूत और बेहतर क्वालिटी का उत्पाद निखर कर आएगा।
उत्पादकों को इसका मूल्य भी काफी अच्छा मिलेगा और बाजार में मांग भी बढ़ेगी। इसके लिये रेशम बोर्ड से बड़े बुनकरों को तकनीकी जानकारी हासिल करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार की रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की अनेक योजनाएं हैं।
रेशम रिफाइनिंग का संयंत्र स्थापित करने के लिये 50 से 80 प्रतिशत की राशि केन्द्र सरकार वहन करेगी। दस फीसदी राज्य सरकार और केवल दस प्रतिशत की लाभार्थी को वहन करना होगा।
इससे पूर्व, उपायुक्त ने केन्द्रीय रेशम बोर्ड तथा स्थानीय बुनकरों द्वारा रेशम उत्पादों पर लगाई गई प्रदर्शनियों का अवलोकन किया।

