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कुल्लू टूडे

बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीमद भागवत कथा के छठे दिन प्रवचनों की अमृतवर्षा करते हुए पंडित भास्करानंद शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के हाथों कंस के उद्धार का प्रसंग सुनाया।

उन्होंने कहा कि जब कंस के पाप अत्यधिक बढ़ गए तो सभी भयभीत हो गए।

ऐसे में कंस को भी भय था कि उसके प्राणों का घातक न सिर्फ जन्म ले चुका है बल्कि सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है।

शिशु रूप कान्हा को मारने के लिए कंस ने कागासुर, बकासुर तथा पूतना जैसे दुर्दांत राक्षकों को भेजा लेकिन कान्हा ने उनका वध कर दिया।

कंस ने अपने षड़यंत्र की पूर्ति करते एक मल युद्ध रखा जिसमें आसपास के इलाके के पहलवानों को सादर आमंत्रित किया। कृष्ण और बलराम ने जब सबसे पहले शिव धनुष तोड़ा तो कंस का भय और बढ़ गया।

क्योंकि कंस का मालूम था कि जो इस धनुष को तोड़ेगा वही उसका काल बनेगा। इन दोनो नौनिहालों ने कंस से सभी योद्धाओं को मार दिया।

इसी दौरान एक कुबलिया पीड़ हाथी जिसको मदिरापान करवाया गया था, को भी कान्हा से लड़ने के लिए भेजा। इन दोनों भ्राताओं ने इस मदमस्त हाथी को पूंछ से पकड़कर आसमान में फेंक दिया।

इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने एक छलांग लगाई और कंस को पकड़ा तथा भूमि पर पटक दिया।

उन्होंने कंस को उसके बालों से पकड़ा तो कंस मृत्यु नजदीक देख जीवन की भीक्षा मांगने लगा।

इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि जिसे वह पकड़ लेते हैं उसका वे उद्धार करके ही छोड़ते हैं। और आप तो मामा हो अर्थात मां तो एक है और ज्यादा स्नेह और प्रेम का मतलब मा मा होता है।

भगवान ने कहा कि जिस प्रकार मामा आपने मेरे मां को केसों से पकड़कर उन्हें यातनाएं दी थी तो आप को भी वहीं यातनाओं से गुजरना होगा। इतने में भगवान ने एक मुष्टिका के प्रहार से कंस को प्राणमुक्त कर दिया।

भास्करानंद शर्मा ने बताया कि पापी कितना भी बलशाली क्यों न हो उसके पापों का अंत अवश्य होता है।

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