कुल्लू टूडे
बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर
हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर के अमरपुर पनौल में स्थित शिव मंदिर में शुरू हुई श्रीराम कथा के पहले दिन भव्य शोभायात्रा निकाली गई।
कथा वाचक पंडित सुरेश भारद्वाज की अगवाई में आयोजित इस शोभायात्रा में महिलाओं और पुरूषों ने भाग लिया।
पहले दिन प्रवचन करते हुए पंडित सुरेश भारद्वाज ने प्रथम दिवस पर उपस्थित श्रद्धालुओं को श्रीमद भागवत कथा व रामायण जैसे पावन ग्रंथों के बारे में बहुत ही सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि देवताओं तक को अपने में वशीभूत करने वाले मायावी का नाम ही तो विष्णु है। भगवान विष्णु ने अपनी माया से सृष्टि में जीवन को जीने का संदेश दिया।
भगवान श्रीकृष्ण के रूप में जहां उन्होंने रास रचाया वहीं भगवान श्रीराम के रूप अपनी माया का संचार कर गृहस्थ, रिश्ते व नाते प्रेम की अविरल धारा का प्रवाह किया।
पंडित सुरेश भारद्वाज ने बताया कि रावण कोई अपराधिक प्रवृति का नहीं था, उसकी प्रवृति दैवीय थी, जिसने भगवान शंकर तक को अपने वश में कर लिया था तो चिंतन करों कि वह कितना बड़ा भक्त था।
उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु का वरण प्राप्त करने के लिए रावण ने जो लीला रची वह वास्तव में अदभुत थी।
उन्होंने पुत्री समान माता सीता का हरण नहीं किया था। बल्कि वे अपने साथ उन्हें आग्रह पूर्वक लंका ले गए थे। जहां पर उन्होंने माता सीता को अशोक वाटिका नामक बाग में रखा।
पंडित ने बताया कि अशोक वाटिका जैसे नाम से ही पता चलता है कि जहां पर शोक न हो, वहां माता सीता का निवास बनाया और उनकी सेवा के लिए विभिषण की पुत्री त्रिजटा व अन्य दासियों की तैनाती की गई ताकि इन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो।
यही नहीं उस स्थान पर किसी को भी आने जाने की अनुमति नहीं थी।
पंडित ने बताया कि जिस स्थान पर रावण ने वैदेही को रखा था वह ब्रम्हाड की सबसे सुरक्षित जगह थी। उन्होंने बताया कि अयोध्या भी इतनी सुरक्षित नहीं थी।
इस पर उन्होंने एक कौए द्वारा माता सीता के चरणों पर चोंच मारकर उन्हें घायल करने का प्रसंग सुनाया।
इसी तरह कालातंर परिवर्तन में भगवान राम ने जब लंका पर चढ़ाई की तो रावण का वध प्रभु के हाथों हुआ।
रावण ने अपने सभी सगे संबंधियों की मृत्यु के लिए भगवान राम का सहारा लिया और उनके शुभ हाथों से यह कार्य जानबूझ कर करवाया।
कथा समापन पर श्रीराम जी के सुंदर भजन सुनाए गए तथा प्रसाद वितरण किया गया।
