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कुल्लू टुडे
कुल्लू


हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहुल स्पीति में बनाई जाने वाली जुराब व दस्ताने को भौगोलिक संकेत (जी.आई. टेग) मिल गया है। सेव लाहुल-स्पीति सोसायटी को हिमाचल प्रदेश पेटेंट सूचना केंद्र एचपी काउंसिल फॉर साइंस टेक्नोलॉजी फॉर एनवायरमेंट द्वारा यह भौगोलिक संकेत (जी आई) टेग जारी किया गया है।

यह भौगोलिक संकेत बुने हुये लाहौली जुराब और दस्ताने उत्पाद को सोसायटी द्वारा पंजीकृत करने के बाद दिया गया है। अब इस उत्पाद की मालिक लाहुल की यह सोसाइटी बन गई है।

इस संबंध में जानकारी देते हुये सेव लाहुल स्पीति सोसाइटी के अध्यक्ष प्रेम चंद कटोच ने बताया कि निश्चित रूप से लाहुल घाटी के पारंपरिक हस्तशिल्प को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए यह सराहनीय सामूहिक प्रयास है। जिसकी शुरुआत बेहतरीन तरीके से हुई है।

उन्होंने बताया कि लाहुल के बुनकर क्षेत्र में जुराब और दस्ताने अहम स्थान रखते हैं और यहां इस उत्पाद को बहुत ही ज्यादा तरजीह दी जाती है। लिहाजा बुनाई व कताई का इतिहास भी घाटी में काफी अहम रहा है। सोसाइटी ने घाटी के इस उत्पाद को संरक्षित करने की दिशा में यह काम किया है।

उन्होंने कहा कि 1856 में मोरेबियन मिशनरी के केलांग आगमन के साथ-साथ विशेष रूप से लाहुल में बुनाई पर लिखित जानकारी सामने आने लगी थी। मिशनरियों की पत्नियों में खासकर मारिया हाईडे ने केलंग में पहले बुनाई स्कूल की स्थापना की थी।

स्कूल ने स्थानीय महिलाओं में बुनाई कौशल को विकसित करने में अहम योगदान दिया। उसके बाद घाटी में बुनाई उत्पाद में आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण की शुरुआत भी हुई थी।

लिहाजा यह बुनाई का काम घाटी में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता गया और लोगों की जरूरतों को भी पूरा करता गया। लेकिन इस उपलब्धि से यहां की जुराब व दस्ताने को नये आयाम मिलेंगे।

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