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कुल्लू टूडे

बिलासपुर/कश्मीर ठाकुर

प्रसिद्ध कथावाचक एवं विद्वान पंडित सुरेष भारद्वाज ने श्राद्धों को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए जनमानस को जागरूक किया है। उन्होंने श्राद्ध के महत्व और विधि आदि पर भी विस्तार से प्रकाष डाला है।

उन्होंने बताया कि श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए, या पितरों के लिए श्रद्धा पूर्वक किए गए पदार्थ दान (हविश्यान, तिल, कुष व जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है।

श्राद्ध कर्म, पितृ ऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्ष भर प्रसन्न रहते है।

श्राद्ध कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे संबंधियों को ही नहीं बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंत सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। उन्होंने कहा कि पितरों की पूजा को साक्षात विष्णु पूजा ही माना गया है।

शास्त्रों में मनुष्य के लिए कुल तीन ऋण बताए गए हैं जिनमें देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण शामिल है।

यह तीन प्रकार के ऋण बतलाए गए हैं, इनमें श्राद्ध द्वारा पित्र ऋण उतारना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि जिन माता पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख, सौभाग्य की वृद्धि के लिए अनेक यत्न या प्रयास किए हैं, उनके ऋण से मुक्त न होने पर मनुष्य जन्म ग्रहण करना निरर्थक माना जाता है।

उन्होंने कहा श्राद्ध से तात्पर्य हमारे मृत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व सम्मान प्रकट करना है।

पंडित भारद्वाज ने बताया कि तिथि के दिन प्रात काल उठकर किसी पवित्र नदी अथवा घर में ही स्नान करके पितरों के नाम से तिल, चावल और कुशा घास हाथ में लेकर पितरों को जल अंजलि अर्पित करें, इसके उपरांत मध्यकाल में श्राद्ध कर्म करें और ब्राह्मणों को भोजन करवाकर स्वयं भोजन करें।

उन्होंने बताया कि शास्त्रानुसार जिस स्त्री के कोई पुत्र ना हो वह अपने पति का श्राद्ध कर सकती है। इस दिन गया तीर्थ में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने के विशेष माहात्म्य माना जाता है। प्राय परिवार का मुखिया या सबसे बड़ा पुरुष ही श्राद्ध करता है। उपरोक्त विधि से जिस परिवार में श्राद्ध किया जाता है वहां यशस्वी लोग उत्पन्न होते हैं।

ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृ गण श्राद्धकर्ता को आयु, धन, विद्या, सुख संपत्ति आदि प्रदान करते हैं। पितरों के पूजन से मनुष्य को आयु पुत्र, यश, कीर्ति, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। माना जाता है कि गया में श्राद्ध करने के बाद पितर देवलोक प्रस्थान कर जाते हैं।

कुछ विद्धान गया श्राद्ध को अंतिम श्राद्ध मानते हुए श्राद्ध न करने का परामर्ष देते हैं जो कि पूर्णत अनुचित है। ऐसी बातें कह कर वे आम जनमानस को भ्रमित करते हैं।

जबकि योगिनी हृदय ग्रंथ अनुसार कोई अपने कल्याण के लिए श्राद्ध करें तो गया मातम श्राद्धमं अर्थात यह आत्म पिंड श्राद्ध आदि के लिए है। मृत पितरों के लिए नहीं, वह तो मृत पितरों के लिए सदा ही श्राद्ध करें।

उन्होंने बताया कि षास्त्रानुसार गया श्राद्ध के पष्चात भी बदरीका क्षेत्र के ब्रम्हाकपाली में श्राद्ध करने का विधान है।

शास्त्रों में वर्णन है कि प्राचीन काल में जहां ब्रह्मा जी का सिर गिरा था, उस क्षेत्र को ब्रह्म कपाली कहा जाता है गया में श्राद्ध करने के उपरांत अंतिम श्राद्ध ब्रह्माकपाली में किया जाता है।

उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में श्राद्ध क्षेत्रों का वर्णन प्राप्त होता है। जिनमें श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है। यह स्थान है प्रयाग, पुष्कर, कुषावर्त (हरिद्वार) गया एवं ब्रह्मकपाली (बदरीका क्षेत्र) हैं।

उन्होंने कहा कि कई लोगों को भ्रम होता है कि गया श्राद्ध करने के उपरांत श्राद्ध पक्ष में तर्पण व ब्राह्मण भोजन बंद कर देना चाहिए या एक गलत धारणा है।

शास्त्रानुसार गया में श्राद्ध करने के उपरांत भी अपने पितरों के निमित्त तर्पण व ब्राह्मण भोजन को बंद नहीं करना चाहिए। केवल उनकी निमित धूप छोड़ना बंद करना चाहिए। गया श्राद्ध के उपरांत ब्रम्हाकपाली में श्राद्ध किया जाना चाहिए। इसके बाद तर्पण और ब्राहम्ण भोज की बाध्यता समाप्त हो जाती है।

शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि गया एवं ब्रह्मा का पानी में श्राद्ध करने के उपरांत भी अपने पितरों को तर्पण ब्राह्मण भोजन अथवा आमान्न (सीधा) दान किया जाना चाहिए। इस बार श्राद्ध पक्ष 29 सितंबर से शुरू होकर 14 अक्तूबर तक चलेंगे।

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