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कुल्लू टूडे

कुल्लू, विनोद महंत

देवभूमि कुल्लू में वैरागी समुदाय के लोग विशेष होली मनाते हैं उनकी कुल्लू में यह होली ब्रज में मनाई जाने वाली होली की तर्ज पर होती है।

ब्रज की भाषा में होली के गीत वृंदावन के बाद कुल्लू घाटी में ही गूंजते हैं। परंपरागत इन गीतों को गाते हुए यह समुदाय चालीस दिनों तक इस होली उत्सव को मनाता है।

कुल्लू में मनाई जाने वाली यह अनोखी होली बसंत पंचमी से शुरू होती है। तब से ही इस समुदाय के लोग एक दूसरे के घरों व मंदिरों में जाकर होली मनाते हुए गुलाल उड़ाते हैं और होली के गीत गाते हैं।

उसके बाद जब देश में मनाई जाने वाली होली को आठ
दिन शेष रहते हैं तो उस दिन से इस समुदाय की होली में होलाष्ठक शुरू होते हैं जिसमें इस समुदाय के लोग रघुनाथ को हर दिन गुलाल लगाते हैं और आठवें दिन होली का उत्सव मनाया जाता है।

इस समुदाय द्वारा मनाई जाने वाली इस होली का संबंध नगर के झीड़ी और राधा कृष्ण मंदिर नग्गर ठावा से भी है। बताया जाता है कि इस समुदाय के गुरू पेयहारी बाबा रहते थे और उन्हीं की याद में इस समुदाय के लोग टोली बनाकर नग्गर के ठावा और झिड़ी में जाकर भी होली के गीत गाते हैं।

समुदाय के लोग हर साल उनके तपोस्थली में होली से एक दिन पहले जाते हैं और पूरा दिन होली के गीत गाते हैं आशीर्वाद लेते हैं। बैरागी समुदाय के राज कुमार महंत, दीपक महंत, मुरारी महंत, महावीर महत, संत राम महत, युद्धवीर महंत, ओम प्रकाश महंत के अनुसार उनकी यह होली बहुत पुरानी है।

सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार छोटे कभी भी अपने से बड़े लोगों के सिर और मुंह में गुलाल नहीं लगाते और वे अपने से बड़े लोगों के चरणों में गुलाल फेंकते हैं और बड़े

आशीर्वाद स्वरूप छोटों के सिर पर गुलाल फेंकते हैं। खासकर ब्रज की भाषा में ये समुदाय सखी री कोई मोड़ लैया वन को चले दोनों भाई गीत राम और लक्षमण व सीता के वनवास जाने की व्याख्या करते है।

होली के इन गीतों को रंगत देने के लिए वैरागी समुदाय के लोग डफली और झांझ आदि साज का इस्तेमाल करते हैं। इन साजों का प्रयोग भी सिर्फ ब्रज में ही होता है।

बताया जा रहा है कि इस समुदाय द्वारा मनाई जाने वाली यह होली रघुनाथ से भी जुडी हुई है।

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