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कुल्लू टूडे

बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर

अमरपुर पनौल में स्थित शिव मंदिर में चल रही श्रीराम कथा के दसवें दिन प्रवचन करते हुए पंडित सुरेश भारद्वाज ने कहा कि जब वनवासी राम गंगा पार करने के लिए किनारे पर आए तो निषादराज को उनसे मिलने का अवसर मिला। प्रभु राम ने अपने बचपन के मित्र को गले लगाया। हर्ष से गदगद निषादराज ने उनके चरण धोने के अनुमति मांगी।

प्रभु निषाद राज का मंतव्य समझ गए और मुस्कुराते हुए स्वीकृति प्रदान की। इस दौरान भगवान राम ने कहा कि किसी के स्पर्श करने से कोई अछूत नहीं होता।

व्यक्ति अपने कर्मो से अच्छा या बूरा होता है न कि कुल में जन्म लेने से। उन्होंने कहा कि अज्ञानी स्वयं तो अंधकार में रहता है बल्कि दूसरों को भी अंधकार में रखता है। इस अवसर पर पूर्व मंत्री राजेंद्र गर्ग ने भी कथा श्रवण किया।

वहीं पंडित सुरेश भारद्वाज ने कहा कि  भगवान राम ने भी तरह-तरह की लीलाओं से संसार को जीवन जीने की कला सीखाई तथा धरती पर से पाप का नाश किया। इस दौरान

उन्होंने एक और रोचक प्रसंग सुनाया। पंडित जी ने कहा कि माता कैकेयी जानती थी कि राम भगवान विष्णु के अवतार है। एक दिन भगवान राम ने कैकेयी से कहा कि हे माता मुझे आपसे वनवास चाहिए।

प्रभु भक्त से कृपा मांगे तो भक्त का यह अहोभाग्य होता है, ऐसे में कैकेयी ने बिना कुछ सोचे राम को हां कर दी। राम ने कहा कि माता इससे तुम्हारे दो अहित होंगे। एक तो तुम विधवा हो जाओगी और दूसरे संसार में कोई भी प्राणी अपनी पुत्री का नाम कैकेयी नहीं रखेगा।

कैकेयी ने दोनो अहितों को स्वीकार करते हुए भगवान राम से भी बदले में कुछ मांगने की इच्छा जाहिर की। राम ने कहा कि मांगों माता क्या मांगती हो, कैकेयी ने कहा कि भगवन आपको अगला अवतार मेरे गर्भ से लेना होगा।

इस पर भगवान राम बोले की माता यह वरदान तो मैं देवकी जी को पहले ही दे चुका हूं किंतु इतना वरदान अवश्य दे सकता हूं कि मेरा सारा बचपन कृष्ण रूप में आपकी गोदी में गुरजेगा और आप संसार में माता यशोधा के नाम से जानी जाएंगी। कालांतर परिवर्तन में परिस्थतिवश यही क्रम हुआ। माता कैकेयी ने प्रभु राम को नमन किया और उनकी जय जयकार की।

पंडित सुरेश भारद्वाज ने कहा कि रामायण से हमें गृहस्थ को सुधारने तथा सही मायनों में जीवन जीने की कला को सीखने की सीख मिलती है। कथा समापन पर भजन कीर्तन के बाद प्रसाद वितरण कार्यक्रम भी किया गया।

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