कुल्लू टूडे
बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर
शहर के रौड़ा सेक्टर में चल रही श्रीमद भागवत कथा के पांचवें दिन पंडित आचार्य सुनील वशिष्ठ ने गोवर्धन पर्वत, पूजा और छप्पन भोग के रहस्य के श्रद्धालुओं को समझाया।
उन्होंने कहा कि हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में तीर्थयात्रा करते हुए पुलस्त्य ऋषि गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे, तो इसकी सुंदरता देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गए।
तब उन्होंने द्रोणाचल पर्वत से निवेदन किया कि आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए, मैं उसे काशी में स्थापित कर वहीं रहकर पूजन करुंगा।
द्रोणाचल यह सुनकर दुखी हो गए, लेकिन गोवर्धन पर्वत ने ऋषि से कहा कि मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं लेकिन मेरी एक शर्त है। आप मुझे जहां रख देंगे मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। पुलस्त्य ने गोवर्धन की यह बात मान ली।
रास्ते में ब्रज आया, उसे देखकर गोवर्धन सोचने लगे कि भगवान श्रीकृष्ण.राधा जी के साथ यहां आकर बाल्यकाल और किशोर काल की बहुत सी लीलाएं करेंगे। तब उनके मन में यह विचार आया कि वह यहीं रूक जाएं।
यह सोचकर गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य ऋषि के हाथों में और अधिक भारी हो गया। जिससे ऋषि को विश्राम करने की आवश्यकता महसूस हुई।
इसके बाद ऋषि ने गोवर्धन पर्वत को ब्रज में रखकर विश्राम करने लगे। ऋषि ये बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं रखना नहीं है।
कुछ देर बाद ऋषि पर्वत को वापस उठाने लगे, लेकिन गोवर्धन ने कहा कि ऋषिवर अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता। तब ऋषि ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया।
अत: आज से प्रतिदिन तिल.तिल कर तुम्हारा क्षरण होता जाएगा। फिर एक दिन तुम धरती में समाहित हो जाओगे। तभी से गोवर्धन पर्वत तिल.तिल करके धरती में समा रहा है। कहा जाता है कि कलियुग के अंत तक यह धरती में पूरा समा जाएगा।
उन्होने कहा कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पर्वत पर कई लीलाएं की थीं। इसी पर्वत को इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए उन्होंने अपनी सबसे छोटी उंगली पर तीन दिनों तक उठा कर रखा था।
