कुल्लू टूडे
बिलासपुर/कश्मीर ठाकुर
हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर से 22 किलोमीटर दूरी पर बरमाणा में स्थित ऐतिहासिक गुग्गा मंदिर में मेला यानि सांपों के देवता का मेला सावन की पूर्णिमा यानी राखी के आते ही यह कुछ दिनों बाद शुरू हो जाता है।
गुग्गा जी के पुजारी सुरेंद्र शर्मा ने बताया कि नवमी को सांपों के देवता गुग्गा जाहर पीर की आरती होती है और दसवीं को रोट चढ़ाया जाता है और उसी दिन से मेला भी शुरू हो जाता है।
बताते चलें कि गुग्गा जी की बरमाणा तपोस्थली पर सैकड़ों वर्ष बीत गए लेकिन आज भी उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान और वहीं गुग्गा जी की घोड़े पर सवार मूर्ति है। यहां गुग्गा जी की तपोस्थली की मिटटी में एक अनोखी विशेषता है।
अगर कहीं सांप ने किसी को काट दिया तो लोग पीड़ित को यहां मंदिर में लाते है या फिर इस स्थल की मिटटी को ले जाकर पीड़ित व्यक्ति को मिटटी का मरहम लगते है जिससे पीड़ित व्यक्ति को फायदा पहुँचता है।
बिलासपुर जिले का गुग्गा मेला हिमाचल प्रदेश में आयोजित होने वाले अनेक कार्यक्रमों, उत्सवों घटनाओं में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
हिमाचल प्रदेश एवं देश के अन्य भागों से इस महीने में प्रतिवर्ष लाखों लोग गुग्गा जी के मंदिर में मत्था टेकते हैं तथा छड़ियों की विशेष पूजा करने के लिए बरमाणा कस्बे में आते हैं। बरमाणा में आयोजित होने वाला यह धार्मिक मेला न केवल यहां की कला, संस्कृति और वातावरण को प्रकट करता है बल्कि यह मेला यहां के लोगों की साँपों के देवता के प्रति आस्था को भी प्रदर्शित करता है।
अनेक लोग इस मेले में आते हैं और इस धार्मिक तपोस्थली पर अपनी मन्नतों को गुग्गा जी से मांगते है।
सावन की पूर्णिमा यानी राखी आते ही इस जिले के आस पास जगह जगह हाथ में लोहे की छड़ी लिए बच्चे और बड़े दिखाई देते हैं। उस छड़ी पर कुछ रंग-बिरंगी चुन्नियां, सुहागी, धूप बत्ती लगाए हुए होते हैं और जैसे ही किसी आंगन में पहुंचते हैं जोर से जयकारा लगाते हैं “जय गुग्गा जाहर पीर”।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर भादों के शुक्ल पक्ष की दशमी तक के जो दस दिन होते हैं वो जाहर पीर गुग्गा जी को समर्पित किए जाते हैं।
बरमाणा में गुग्गा मेले में गुग्गा जाहिर वीर के जयकारों के साथ भक्ति की अविरल धारा बहती है।
गुग्गा जी वैसे राजस्थान के लोक देवता हैं और उनको “गोगा वीर” “गोगा पीर” के नाम से जानते हैं। गुग्गा जी गुरू गोरखनाथ के शिष्य थे।
राजस्थान के हनुमानगढ जिले में गोगामढी नामक शहर है जहां भादों महीने में शुक्ल पक्ष की नवमी और दशमी को मेला लगता है।
राजस्थान के अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल के बरमाणा में भी गुग्गा जी बहुत प्रसिद्ध हैं। गुग्गा जी को सांपों का देवता के रूप में पूजा करते हैं।
इन दस दिनों में जगह जगह गुग्गा जी के नाम पर रात को डेरा कराया जाता है जिसमें सब लोग इकट्ठा होते हैं और गुग्गा जी की गाथाएँ गाई जाती हैं।
लोग एक समूह बनाकर डमरू, हारमोनियम, आदि अन्य लोकल वाद्ययंत्रों के साथ मंडली में गुग्गा जी की आरती और गाथाएँ घर घर जा कर गाते हैं।
बच्चे हाथ में लोहे की छड़ लेकर घर घर गुग्गा जी की कार करते हैं और बदले में लोग उन्हें अनाज, पैसे आदि देते हैं।
भादों की नवमी या दशमी को वो लोग जाकर इक्कठे हुए पैसे और अनाज में से कुछ हिस्सा गुग्गा जी को चढाया जाता है।
लोग भी नवमी और दशमी को जाकर गुग्गा जी को रोट चढाते हैं और उनसे अपनी दया बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
जिसको ये गुग्गे वाले घर घर जा कर और गा कर सुनाते हैं और जन्माष्टमी के दिन इसका समापन हो जाता है।
रोट बनाकर बरमाणा के पास भटेड़ या फिर गेहड़वी में स्थित गुग्गा मंदिर में माथा टेकने जाते हैं। इसके अलावा हिमाचल के और स्थानों पर भी गुग्गा जी के मंदिर हैं।
लेकिन बरमाणा का गुग्गा की तपोस्थली में एक अलग विशेषता है। पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन से आगामी सात दिनों तक गुग्गा की कथाएं सुनने से सुख मिलता है और दुख व कष्ट दूर होते हैं।
गुग्गा की इस कथा के गुणगान का यह क्रम जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी को समाप्त होता है। बिलासपुर के बरमाणा में स्थित ऐतिहासिक गुग्गा मेले के लिए गुग्गा मंदिर की एक अपनी अनोखी विशेषता है।
इसके अलावा स्थानीय युवाओं की गठित गुग्गा मेला उत्सव कमेटी के प्रयासों से पिछले करीब 23 वर्षों से इन खेलों के आयोजन की विशेषता में निखार लाने के लिए गुग्गा नवमी और दसवीं को सांस्कृतिक संध्या का प्रर्दशन होता है जिसमें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कलाकार शिरकत करते है।
