कुल्लू टूडे
बिलासपुर, कश्मीर ठाकुर
नगर के डियारा सेक्टर में स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीशिव महापुराण कथा के चैथे दिन प्रवचन करते हुए कथा वाचक सुशील कुमार ने माता सती का प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर किया।
उन्होंने बताया कि राजा दक्ष की पुत्री सती ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से विवाह किया था। पार्वती और शंकर के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पुत्र. गणेश, कार्तिकेवय और पुत्री वनलता।
उन्होंने कहा कि मां सती ने एक दिन कैलाशवासी शिव के दर्शन किए और वह उनके प्रेम में पड़ गई।
लेकिन सती ने प्रजापति दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया। दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि सती ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी वेशभूषा और शक्ल दक्ष को बिलकुल भी पसंद नहीं थी और वह अनार्य था।
दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई।
लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती के लिए अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना घोर अपमानजनक था।
सती यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।
पंडित ने बताया कि सती को दर्द इस बात का भी था कि वह अपने पति के मना करने के बावजूद इस यज्ञ में आई थी, यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है। जब शंकर को इस बारे में पता चला तो वह बहुत दुखी हुए शिव ने वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया।
क्रोधित शिव अग्निकुंड से माता सती को उठाकर ब्रम्हाड की ओर निकल पड़े। इस दौरान जहां जहां सती के अंग गिरे वहीं पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
उन्होने बताया कि देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं।
