विनोद महंत
कुल्लू टुडे
मां हिडिंबा की मौजूदगी में ही रथ यात्रा आरंभ होती है और मेले का आरंभ ढालपुर मैदान में रघुनाथ जी की प्रतिमा के पदार्पण से होता है। दरअसल, दशहरा उत्सव के तीन मुख्य पड़ाव होते हैं। ‘ठाकुर निकलना’, ‘मोहाला’ और ‘लंका दहन’। दशहरे का पहला दिन ‘ठाकुर निकलना’ कहलाता है। रघुनाथ जी की प्रतिमा को उनके मंदिर से एक पालकी में लाकर मैदान तक पहुंचाया जाता है। रघुनाथ जी की शोभा यात्रा के ढालपुर मैदान पहुंचने से पहले ही कुल्लू जिला के सभी देवी-देवता भगवान रघुनाथ के रथ के समीप एकत्रित होते हैं।
रघुनाथ जी की प्रतिमा को पालकी से उतार कर रथ पर विराजमान किया जाता है। फिर पूजा-अर्चना के उपरांत आरंभ होती है भव्य रथ यात्रा। देवी-देवताओं की पालकियों से घिरा भगवान रघुनाथ का रथ जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के बीच आगे बढ़ता है तो हजारों शीश भगवान रघुनाथ की श्रद्धा में झुक जाते हैं। भगवान रघुनाथ के जयघोष के साथ भक्त उनके रथ को खींचकर ढालपुर मैदान के मध्य स्थित अस्थायी शिविर तक पहुंचाते हैं। रथ को खींचना अत्यंत शुभ माना जाता है।
श्री रघुनाथ जी की प्रतिमा को अस्थायी शिविर में रखा जाता है। उत्सव के दौरान बीज पूजा, रथ पूजन, शिविर पूजन, देव पूजन तथा राम रास का विशेष विधान है। ढालपुर मैदान को अठारह करड़ू की सौ भी कहा जाता है। दशहरा उत्सव के दौरान इस मैदान को नई नवेली दुल्हन की तरह सजाया गया है। शिविरों में सजी देवी-देवताओं की पालकियांे से ढालपुर मैदान का चार चांद लग जाते हैं। प्रातः व संध्या के समय पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के बीच जब देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है तो वातावरण भक्तिभाव से भर जाता है। ऐसा लगता है कि मानो पूरा देवलोक ही ढालपुर मैदान में उतर आया हो। लोगों में अपने अराध्य देव के प्रति विश्वास
व श्रद्धा सागर में उठने वाली लहरों के मानिंद साफ दिखाई देता है।
