विनोद महंत
कुल्लू टुडे
विश्व पटल पर देव परंपरा के नाम पर अपना डंका बजा चुके दशहरा उत्सव के बारे में जानकारी रखनी आवश्यक है। कुल्लू के प्रसिद्ध दशहरा उत्सव का इतिहास साढ़े तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना है। इसका आयोजन सत्रहवीं
सदी में कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में आरंभ हुआ।
राजा जगत सिंह ने वर्ष 1637 से 1662 ईस्वी तक शासन किया। उस समय कुल्लू रियासत की राजधानी नग्गर हुआ करती थी। दशहरे के आयोजन के पीछे भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि राजा जगत सिंह के शासनकाल में मणिकर्ण घाटी के गांव टिप्परी में एक गरीब ब्राह्मण दुर्गादत्त रहता था। उस गरीब ब्राह्मण ने राजा जगत सिंह की किसी गलतफहमी के कारण आत्मदाह कर लिया।
गरीब ब्राह्मण के इस आत्मदाह का दोष राजा जगत सिंह को लगा। इससे राजा जगत सिंह को भारी ग्लानि हुई और कई इतिहासकार तो बताते हैं कि इस दोष के कारण राजा को एक असाध्य रोग भी हो गया था। असाध्य रोग से ग्रसित राजा जगत सिंह को झीड़ी के एक पयोहारी बाबा किशनदास ने सलाह दी कि वह अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान राम चंद्र, माता सीता और रामभक्त हनुमान की मूर्ति लाकर कुल्लू के मंदिर में स्थापित करके अपना राज-पाट भगवान रघुनाथ को सौंप दे तो उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिल जाएगी।
इसके बाद राजा जगत सिंह ने श्री रघुनाथ जी की प्रतिमा लाने के लिए बाबा किशनदास के चेले दामोदर दास को अयोध्या भेजा। दामोदर दास वर्ष 1651 में श्री रघुनाथ जी और माता सीता की प्रतिमा लेकर गांव मकड़ाह पहुंचे। माना जाता है कि ये मूर्तियां त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के दौरान बनाई गई थीं। वर्ष 1653 में रघुनाथ जी की प्रतिमा को मणिकर्ण मंदिर में रखा गया और वर्ष 1660 में इसे पूरे विधि-विधान से कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में स्थापित किया गया। राजा ने अपना सारा राज-पाट भगवान रघुनाथ जी के नाम कर दिया तथा स्वयं उनके छड़ीबदार बने।
कुल्लू के 365 देवी-देवताओं ने भी श्री रघुनाथ जी को अपना ईष्ट मान लिया। श्री रघुनाथ जी के सम्मान में ही राजा जगत सिंह ने वर्ष 1660 में कुल्लू में दशहरे की परंपरा आरंभ की। तभी से भगवान श्री रघुनाथ की प्रधानता में कुल्लू के ओर-छोर से पधारे देवी-देवताओं का विराट सम्मेलन यानि दशहरा मेले का आयोजन अनवरत चला आ रहा है।
रथयात्रा व अन्य परंपराएं
इस सात दिवसीय देव समागम में कुल्लू के सभी देवी-देवताओं की श्री रघुनाथ जी के सम्मान में आने की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। इन देवताओं के बैठने के स्थान भी निर्धारित हैं। प्राचीन काल में पालगी-धारा गड़सा के देवता दुर्वासा ऋषि, नीणू के नारद मुनि और ढालपुर के गौहरी नाथ आदि देवताओं के नवरात्रों में आने की प्रथा थी। इनके आने से ही दशहरा उत्सव के आरंभ होने का वातावरण बनता था।
बिजली महादेव एक दिन पूर्व आकर टापू स्थित मंदिर में ठहरते हैं। मलाणा के जमदग्नि ऋषि अपने प्रतीक चिह्न के रूप में शामिल होते हैं। जबकि गांव शियाह, हवाई आदि ग्यारह गांव के जमदग्नि ऋषि अपनी पालकी 1⁄4रथ1⁄2 के रूप में लाए जाते हैं। इस तरह कुल्लू दशहरे में अब दो सौ से अधिक देवी-देवता शिरकत करते हैं। पहले यह संख्या 365 होती थी।
इस वर्ष करीब 332 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। उत्सव के पहले दिन सभी देवी-देवता
अपने-अपने रथों-पालकियों में सज-धज कर सर्वप्रथम रघुनाथ जी के मंदिर में पूजा-अर्चना करने के
बाद ढालपुर मैदान की ओर प्रस्थान करते हैं। दशहरा उत्सव में देवी हिडिंबा का विशेष महत्व रहता
है।
मां हिडिंबा की मौजूदगी में ही रथ यात्रा आरंभ होती है और मेले का आरंभ ढालपुर मैदान में रघुनाथ जी की प्रतिमा के पदार्पण से होता है। दरअसल, दशहरा उत्सव के तीन मुख्य पड़ाव होते हैं।
‘ठाकुर निकलना’, ‘मोहाला’ और ‘लंका दहन’
दशहरे का पहला दिन ‘ठाकुर निकलना’ कहलाता है। रघुनाथ जी की प्रतिमा को उनके मंदिर से एक पालकी में लाकर मैदान तक पहुंचाया जाता है। रघुनाथ जी की शोभा यात्रा के ढालपुर मैदान पहुंचने से पहले ही कुल्लू जिला के सभी देवी-देवता भगवान रघुनाथ के रथ के समीप एकत्रित होते हैं। रघुनाथ जी की प्रतिमा को पालकी से उतार कर रथ पर विराजमान किया जाता है। फिर पूजा-अर्चना के उपरांत आरंभ होती है भव्य रथ यात्रा।
देवी-देवताओं की पालकियों से घिरा भगवान रघुनाथ का रथ जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के बीच आगे बढ़ता है तो हजारों शीश भगवान रघुनाथ की श्रद्धा में झुक जाते हैं। भगवान रघुनाथ के जयघोष के साथ भक्त उनके रथ को खींचकर ढालपुर मैदान के मध्य स्थित अस्थायी शिविर तक पहुंचाते हैं। रथ को खींचना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्री रघुनाथ जी की प्रतिमा को अस्थायी शिविर में रखा जाता है।
उत्सव के दौरान बीज पूजा, रथ पूजन, शिविर पूजन, देव पूजन, बलि पूजन तथा राम रास का विशेष विधान है।
छठा दिन भी समेटे हैं कई सांस्कृतिक महत्व के पल दशहरा उत्सव का छठा दिन मोहाला कहलाता है। इस दिन दोपहर बाद दशहरा उत्सव में विराजमान सभी देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी के सम्मान में उनके शिविर में पहुंच कर शीश नवाते हैं। मोहाला संभवत महामिलन या मेल-मिलन की गहमा-गहमी ‘हल्ला’ के अर्थ का द्योतक है।
मोहाले की गहमा-गहमी सचमुच दर्शनीय होती है। मोहाले के दिन गांव के लोग विशेषतरू महिलाएं गेहूं के
भुने दाने जिन्हें ‘धाणा’ कहते हैं, अपने साथ लाकर मेले में सगे-संबंधियों में बांटती हैं। धाणा के साथ भांग के दाने भंगोहलू मिश्रित करें तो यह ज्यादा स्वादिष्ट बनती है। भंगोहलु के स्थान पर अखरोट की गिरी भी मिलाई जाती है। इसलिए धाणा के साथ अखरोट बांटने की भी परंपरा है। ‘मोहाले’ की रात्रि में भगवान रघुनाथ के शिविर के सामने शक्ति पूजन किया जाता है।
अंतिम दिन शिविर में से रघुनाथ जी की मूर्ति को निकालकर रथ में रखा जाता है तथा इस रथ को खींचकर मैदान
के अंतिम छोर तक लाया जाता है। दशहरे में उपस्थित देवी-देवता इस यात्रा में शरीक होते हैं।
देवी-देवताओं की पालकियों के साथ देवलु वाद्य यंत्र बजाते हुए चलते हैं। ब्यास नदी के तट पर एकत्रित घास व लकड़ियों को आग लगाने के पश्चात रथ को पुनरू खींचकर रथ मैदान तक लाया जाता है। इसी प्रकार लंका दहन के साथ ही दशहरा उत्सव की समाप्ति हो जाती है तथा रघुनाथ जी की पालकी को वापस मंदिर लाया जाता है। देवी-देवता भी अपने-अपने गांव के लिए प्रस्थान करते हैं।
ढालपुर मैदान को अठारह करड़ू की सौह भी कहा जाता है। दशहरा उत्सव के दौरान यह मैदान नई
नवेली दुल्हन की तरह सजा होता है। शिविरों में सजी देवी-देवताओं की पालकियों से ढालपुर मैदान
का चार चांद लग जाते हैं। प्रातरू व संध्या के समय पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के बीच जब
देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है तो वातावरण भक्तिभाव से भर जाता है। ऐसा लगता है कि
मानो पूरा देवलोक ही ढालपुर मैदान में उतर आया हो। लोगों में अपने अराध्य देव के प्रति विश्वास व
श्रद्धा सागर में उठने वाली लहरों के मानिंद साफ दिखाई देता है।

